हारा नहीं हूँ मैं
हारा नहीं हूँ मैं
थका हूँ, टूटा हूँ, पर बिखरा नहीं हूँ,
अंधेरे से डर कर कभी ठहरा नहीं हूँ।
हर एक मोड़ ने आज़माया मुझे,
पर हालातों से कभी डरा नहीं हूँ।
ज़ख़्म मिले हैं, पर सुरूर नहीं है,
आँखों में आँसू हैं, गुरूर नहीं है।
झुका नहीं हूँ, किसी के आगे,
झुकना मुझे मंजूर नहीं है ।
हर हार ने कुछ सिखाया है मुझे,
गिरने के बाद उठना सिखाया है मुझे।
अब जंग मेरी आदत बन गई है,
और जीत मेरी ज़रूरत बन गई है।
जो कहते हैं — “अब नहीं हो पाएगा”,
उन्हें हर बार करके दिखाया है।
मैं लहरों से नहीं डरता,
मैंने तूफ़ानों में रास्ता बनाया है।
क्योंकि हारा नहीं हूँ मैं...
अति सुन्दर
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